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Showing posts from July, 2020

ठढ़िया सागक चटनी

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ठढ़िया सागक चटनी    लोढ़ी सिलौट पर पीसल चटनी के स्वाद चहटगर होइत अछि ।  महानगर में ई प्रायः विलुप्त भऽ गेल अछि आ अधिकांश लोक मिक्सी में पिसैत छथि । साभार: वंदना

कन्ना पात आ चकोर के फूल | विशिष्ट ज्ञानवर्धन

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कन्ना पात कोनो ने कोनो रुप मे साग ,भोजनक हिस्सा बनबे करैत छै चाहे सावन रहौ वा भादव 😀 हे लीय चिनहू कोन साग छी और कोना खायल जायत बहुत मोन प्रसंन्न भेल जे लगभग सब के जानकारी मे ऐछ जे इ तैर के खायल जाइत छै आउ आब एकर जानकारी ली जे ई कियैक अपन सबहक खान पान मे जगह बनौनै ऐछ ।  आयुर्वेद उपचार स बेसी खान पानक पद्धति छीयै । जकर बहुत ब्याख्या त नै कतौ भेटै छै लेकिन परंपरा स ओ विहित और निहित रहै छै । एहि कन्नापातक के बारे मे जहां तक हमरा पता ऐछ जे ई लीवर के टौनिक छीयै । एकर गुण शीतल होइत छै और मुत्रल तैं ई प्रमेह मे फायदा करैत छै । शरीर मे भीतर या बाहर कतौ जदि सुजन होइ त एकर पचांग क्वाथ देल जाइत छै । पेटक जलन ,मासिक धर्मक गरवरी ,बांझपन ,मुत्रकृच्छ ,त्वचा रोग मे ई उपयोगी छै । आदिवासी सब एकरा इम्यूनीटी बुस्टर के रुप मे मानै छै। दवाइ के प्रयोग त वैद्यक उपयोगक वस्तु भेल ।लेकिन अपन सबहक पारंपरिक खानपन मे सब समैया वस्तुक समावेश कैल गेल छै जकर पालन केला स बहुत छोट मोट समष्या पैघ भके नै उभरै छै ।  तैं जे समैया उत्पाद छै ओकरा अपन खानपाश मे शामिल करी और एहि स बेसी जानकारी हो त उपलब्ध कराबी 🙏 -----...

कतेक बदलि गेल संसार

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कतेक बदलि गेल संसार *************** चाउरक बदलेन माछ भेटैत छल, आमक बदलेन खरबूजा, झिल्ली कचरी कतय बिलाओल, सांझ पङैत कंसारक भूजा। कतेक बदलि---------। कतय बिलाओल बखारी मुनहर, कतय बिलाओल संदूक आ कोठी, कतय बिलाओल उखैर समाठ मेह, कतय बिलाओल जांत ओ ढेकी। कतेक बदलि---------। भोर-सांझ दुपहर छल लोकक हलचल, भूत-प्रेत चूरीणक डरे तैयो सहमल, तांत्रिक-वैद ओझा सबहक भरमार, जङी-बूटी, बुढ-पुरानक नुस्खा उपचार। कतेक बदलि---------। कतय गेलैय सांचीक धोती कुर्ता, मिरजई-पाग,टीक ठोप आ दुपट्टा, पायर मे खङाम, माथ पर मुरेठा, नै मौगी के घोघ,नै पुरूषक खखसबाक वेवहार। कतेक बदलि---------। आमक गाछी मे नव बांसक झूला, सिंगी-पताली,चोरानुकी आ रासलीला, जुङि-शीतल मे बांसक फुचकारी, करीन पटबय लेल खेती के औजार। कतेक बदलि---------। कतय बिलाओल हुक्का लोली, फगुआ गीत, रंग- अबीर संग माटिक होली, सामा-चकेबा,झिलहोरि आ पराती, नव कुट्टी चूङा संग गुङक वेवहार। कतेक बदलि---------। डमरू बाजय , सबमीलि कय दौङी, के आंगा, के पांछा, सब छौङा छौङी, वाइसकोप सँ सिनेमा देखी बारम्बार, भाट-पमरिया,गुदरिया बाबा के भरमार...

' अरिकंचन / एरकंचन ' निक लागैया की नै?

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अरिकंचन / अरिकोच / अ रिकोंचक तरकारी बनायब आ खायब साधारण बात नै छै। एकर पांच चरण होइ छै, पांचो अवस्थाक फोटो देल अछि। कोनो दालि-भातके कड़ नै छियै। जोगारके अतिरिक्त मेठनि सेहो बड्ड होइ छै। साओन मास जँं अरिकंचन खाइ, ससरि-फसरि बैकुण्ठे जाइ। 🙏 नयनसुख। जे खाद्य पदार्थ अनुपलब्ध हो ओ देखलो सं मोन संतुष्ट करी। 😃 साभार : Prem Chandra Jha, Ishnath Jha and Prema Jha 👌👏👏👏 #arikanchan #FoodiesOfDarbhanga #maithilculture #biharifood #biharicuisine #indiancuisine #indianfood #mithilavillage #indianvillage #village गर्मी और बरसात के मौसम में आपके पास अरिकंच साग की चटनी होती है जिसे साइड डिश के रूप में खाया जाता है और अरिकंच चक्का का झोर जो एक मुख्य कोर्स डिश है। इसे उसी तरह से तैयार किया जाता है जैसे गुजरात में अरवी के पत्तों से तैयार किया जाता है। सूरज से सूखने के बाद तैयार चाक (पहिए) को सरसों के तेल में तला जाता है और हल्के पानी वाली सरसों की ग्रेवी में पकाया जाता है। अरिंचन (कोलोकैसिया) संयंत्र के बारे में दिलचस्प बात यह है कि इसमें एक अड़चन होती है जो ठीक से नहीं पकने पर होंठ और मुंह में तीव्र ...

गामक जीवन के मिठास : देसी माछ | अपूर्व स्वाद जँ सिलौठी पर पीसल मशल्ला आ पारम्परिक चुल्हा पर बनल

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'पग-पग पोखरि माछ मखान'   मिथिला के खान-पान : लोक के गामक जीवन के मिठास के दिस अनायास खींच लैत छै। चंन्ना पोठी गइचा भुल्ला कौआ इचना आ विविध माछक संग कांकोर । अंडायल माराक संग गोटपङ्गरा पोठी ।  सिंधी, कबई, गैंची, गरई, टेंगरा  ।  गैंची-पोठी के अलावे गरई, सिंगही आ गोटे-आधे सूही  ।  अपूर्व स्वाद जँ सिलौठी पर पीसल मशल्लाआ पारम्परिक चुल्हा पर बनल इ टेंगरा आ छही माछ भेटय। Photo Credit : जयचन्द्र झा (पघारी) ___________________________________________________________________________________ 'माछ' उठू यौ बौआ भेलै भोर माछक दर्शन कए होउ विभोर ! बाबू अनलन्हि अछि बाजार सँ सिंघी, मांगुर माछ दुइ सेर पोठी, टेंगरा नहि थिक बौआ जे देखि खसै अछि आँखि सँ नोर उठू यौ बौआ भेलै भोर ------ मिथिला थिक ई माछक धरती जतय नदी, पोखरि अछि पाटल माछ, मखान सँ भरल रहैत अछि गामक पोखरि, जलचर चहुँओर उठू यौ बौआ भेलै भोर ------- माछक नाम सुनितहि भरि जाइछ मुंह मे पाइन बनि टपकै लार बड़ प्रिय लागय रोहु, बुआरी, सिंही, मांगुर आ कबई केर झोर उठू यौ बौआ भेलै भोर------- टेंगरा, पोठी बड़ होइछ सुअदगर का...

जय माँ दुर्गा भवानी 🙏

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